आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन और सामाजिक यथार्थ

Authors

  • जितेन्द्र कुमार सिंह

Keywords:

ग्रामीण जीवन, सामाजिक यथार्थ, हिंदी कथा साहित्य, प्रेमचंद, आंचलिक उपन्यास, किसान, दलित जीवन

Abstract

भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, यह कथन केवल भावुक उद्गार नहीं बल्कि एक सामाजिक-ऐतिहासिक तथ्य रहा है, और हिंदी कथा साहित्य ने इस तथ्य को अपनी विषय-वस्तु का आधार बनाया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन के चित्रण और उसमें अभिव्यक्त सामाजिक यथार्थ का अध्ययन किया गया है। अध्ययन प्रेमचंद के किसान-जीवन संबंधी लेखन से आरंभ होकर रेणु, नागार्जुन, भैरवप्रसाद गुप्त, राही मासूम रज़ा और श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं तक पहुँचता है और दलित, स्त्री तथा समकालीन कृषि-संकट से जुड़े कथा-लेखन तक विस्तृत होता है। शोध-पत्र में भू-स्वामित्व, ऋण, जाति-व्यवस्था, पंचायत की राजनीति, शिक्षा और विकास-योजनाओं की विफलता जैसे प्रश्नों के साहित्यिक चित्रण का विश्लेषण किया गया है तथा आंचलिकता और यथार्थवाद के संबंध पर विचार किया गया है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है। निष्कर्ष यह है कि हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन आदर्श और करुणा के चित्रण से आगे बढ़कर आलोचनात्मक, बहुस्तरीय और व्यंग्यपूर्ण यथार्थ तक पहुँचा है। इससे भारतीय ग्रामीण समाज की संरचनात्मक असमानताएँ और परिवर्तन की प्रक्रिया साहित्यिक दस्तावेज़ के रूप में दर्ज हुई हैं।

References

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How to Cite

जितेन्द्र कुमार सिंह. (2026). आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन और सामाजिक यथार्थ. International Journal of Engineering Science & Humanities, 67–79. Retrieved from https://ijesh.com/j/article/view/1242

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Original Research Articles