रीतिकालीन नीतिकाव्य: विविध आयामों का आलोचनात्मक अध्ययन

Authors

  • डॉ. नीरज गुप्ता

Keywords:

रीतिकाल, नीतिकाव्य, वृंद, गिरिधर कविराय, दीनदयाल गिरि, जीवन-मूल्य, लोकचेतना, दोहा, कुंडलिया

Abstract

रीतिकाल (1643–1843 ई.) को प्रायः शृंगार, नायिका-भेद और दरबारी विलास का काल माना जाता है, जिसके कारण इसकी नीतिपरक धारा आलोचना में उपेक्षित रही है। प्रस्तुत शोध-पत्र रीतिकालीन नीतिकाव्य का विश्लेषणात्मक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक पद्धति से अध्ययन करता है। इसमें वृंद, गिरिधर कविराय, दीनदयाल गिरि, बैताल और घाघ जैसे प्रमुख नीतिकवियों के योगदान का मूल्यांकन किया गया है तथा नीतिकाव्य के आठ आयामों—नैतिक, सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, लौकिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक और मानवीय—की पहचान की गई है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह काव्य अस्थिर सामंती परिवेश में जनसामान्य को व्यवहार-कुशलता, संयम, परोपकार और विवेक का मार्ग दिखाने वाला लोकोन्मुखी काव्य था। दोहा, कुंडलिया और छप्पय जैसे छंद, दृष्टांत और अन्योक्ति का प्रयोग तथा सहज ब्रजभाषा इसकी प्रभावोत्पादकता के प्रमुख आधार हैं। शोध यह भी रेखांकित करता है कि नीतिकाव्य के कुछ अंश तत्कालीन सामंती मानसिकता से प्रभावित हैं, अतः इसका आलोचनात्मक पुनर्पाठ आवश्यक है। निष्कर्षतः, समकालीन मूल्य-संकट के संदर्भ में रीतिकालीन नीतिकाव्य एक सरल, संक्षिप्त और प्रासंगिक नैतिक मार्गदर्शिका सिद्ध होता है।

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How to Cite

डॉ. नीरज गुप्ता. (2019). रीतिकालीन नीतिकाव्य: विविध आयामों का आलोचनात्मक अध्ययन. International Journal of Engineering Science & Humanities, 9(4), 163–171. Retrieved from https://ijesh.com/j/article/view/1243