संस्कृत वाङ्मय में नारी की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका
Keywords:
संस्कृत वाङ्मय, नारी, ऋषिका, स्त्रीधन, शक्ति, शकुन्तला, सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिकाAbstract
संस्कृत वाङ्मय भारतीय समाज और संस्कृति की सुदीर्घ परंपरा का दर्पण है, और उसमें नारी का चित्रण सम्मान, नियंत्रण, विद्वत्ता और संघर्ष की बहुरंगी छवियों से बना है। प्रस्तुत शोध-पत्र में वेद, उपनिषद्, स्मृति, महाकाव्य, पुराण, शास्त्रीय काव्य-नाटक तथा कला-शास्त्रों के आधार पर संस्कृत वाङ्मय में नारी की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका का अध्ययन किया गया है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों, अर्थात् मूल ग्रंथों के प्रामाणिक संस्करणों और अनुवादों तथा परवर्ती विद्वानों के विश्लेषणों पर आधारित है। शोध-पत्र में वैदिक ऋषिकाओं और विवाह-सूक्त में नारी की प्रतिष्ठा, उपनिषदों में गार्गी और मैत्रेयी की दार्शनिक उपस्थिति, मनुस्मृति में सम्मान और संरक्षण के द्वंद्व, महाकाव्यों में सीता, द्रौपदी और सावित्री जैसे चरित्र, शास्त्रीय नाटकों में शकुन्तला और वसन्तसेना जैसे पात्र, देवी-उपासना में शक्ति-तत्त्व तथा कला, संगीत और काव्य में नारी की भागीदारी का विश्लेषण किया गया है। साथ ही अल्तेकर के पतन-सिद्धांत और उसकी आलोचना का विवेचन किया गया है। निष्कर्ष यह है कि संस्कृत वाङ्मय में नारी की स्थिति एकरेखीय नहीं, बल्कि कालक्रम, विधा और सामाजिक वर्ग के अनुसार भिन्न-भिन्न रही है, और ग्रंथों में निहित आदर्श तथा सामाजिक यथार्थ के बीच अंतर को ध्यान में रखकर ही उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
References
उपाध्याय, बलदेव. वैदिक साहित्य और संस्कृति. शारदा मंदिर, वाराणसी, 1958.
उपाध्याय, बलदेव. संस्कृत साहित्य का इतिहास. शारदा मंदिर, वाराणसी, 1946 (प्रथम प्रकाशन).
द्विवेदी, कपिलदेव. वैदिक साहित्य एवं संस्कृति. विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी.
वाल्मीकि. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण. गीताप्रेस, गोरखपुर (अनेक संस्करण).
Altekar, A. S. The Position of Women in Hindu Civilization: From Prehistoric Times to the Present Day. Motilal Banarsidass, Banaras, 1938.
Downloads
How to Cite
Issue
Section
License
Copyright (c) 2026 International Journal of Engineering Science & Humanities

This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.


