संस्कृत साहित्य में पर्यावरण चेतना का अध्ययन
Keywords:
संस्कृत साहित्य, पर्यावरण चेतना, पृथ्वी सूक्त, पंचमहाभूत, वृक्षायुर्वेद, कालिदास, प्रकृति संरक्षणAbstract
आधुनिक युग में जलवायु-परिवर्तन, प्रदूषण, वनों के क्षरण और जैव-विविधता के ह्रास ने पर्यावरण संरक्षण को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। इस संदर्भ में प्राचीन भारतीय चिंतन, विशेषतः संस्कृत साहित्य, में निहित प्रकृति-दृष्टि का अध्ययन विशेष महत्त्व रखता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, शास्त्रीय काव्य और नाटक, आयुर्वेद, कृषि-विज्ञान तथा अर्थशास्त्र एवं स्मृति-ग्रंथों में अभिव्यक्त पर्यावरण-चेतना का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों, अर्थात् मूल ग्रंथों के प्रामाणिक संस्करणों, अनुवादों और परवर्ती विद्वानों के अध्ययनों पर आधारित है। शोध-पत्र में पृथ्वी को माता मानने की वैदिक दृष्टि, पंचमहाभूतों और ऋत की अवधारणा, यज्ञचक्र, वृक्षारोपण और जल-संरक्षण संबंधी निर्देश, कालिदास के काव्य में प्रकृति और मनुष्य का सहजीवन, चरक के जनपदोद्ध्वंस-विवेचन, सुरपाल के वृक्षायुर्वेद तथा कौटिल्य के वन-प्रशासन का अध्ययन किया गया है। निष्कर्ष यह है कि संस्कृत साहित्य में पर्यावरण की चिंता धार्मिक, नैतिक, वैज्ञानिक और प्रशासनिक, चारों स्तरों पर विद्यमान है, किंतु उसे आधुनिक पर्यावरणवाद का सीधा पर्याय मानना या ग्रंथों के आदर्श को तत्कालीन व्यवहार से अभिन्न समझ लेना उचित नहीं होगा। प्राचीन ग्रंथ समकालीन पर्यावरण-नीति के लिए नैतिक आधार और प्रेरणा अवश्य प्रदान करते हैं।
References
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